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Goverdhan Parikrama

राधे – राधे’ या ‘राधे – कृष्णा’…. ये ऐसे नाम हैं जो भारतीय जन मानस के रोम – रोम में बसे हुए हैं। मन में कितना भी शोक व्याप्त हो, आप कितनी भी चिंताओं से घिरे हुए हों.. केवल एक बार राधे – राधे जप कर देखिये ! मन हलका हो जायेगा और आप नयी ऊर्जा से भर जायेंगे। राधे – कृष्ण की भक्ति का रस है ही ऐसा, जो एक बार भीगा… बस भीगता ही गया, डूबता ही गया। हर जन्माष्टमी की आधी रात को जब भक्ति अपने चरम पर होती है, ढोल – मंजीरे ज़ोरों पर बज रहे होते हैं और हर ओर बस राधे – राधे सुनाई दे रहा होता है, उस वक्त मन तो मथुरा पहुँच जाता है लेकिन शरीर यहीं दिल्ली में रह जाता है और तभी मन पीछे मुड़ कर शरीर से कहता है ‘अरे कहाँ रह गया ? जल्दी कर और आजा बृज में।’ बहुत समय से इच्छा थी बृज की माटी को अनुभव करने की लेकिन कभी संयोग ही नही बन पाया। शायद जनवरी का महीना रहा होगा, जब मेरे नए – नए लेकिन पक्के वाले मित्र मयंक पाण्डेय ने मुझसे गोवर्धन चलने को कहा। मैने झट से हाँ कह दी। टिकट वगैरह सब तैयार थे, लेकिन यात्रा वाले दिन एक तो ट्रेन क़रीब 5-6 घंटे लेट थी और दूसरा यह कीअगले ही दिन ऑफिस भी जाना था। इसलिए यात्रा रद्द करनी पड़ी। अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन शायद अभी बुलावा नहीं था।

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